देश में राष्ट्रपति चुनाव के लिए दो दिग्गज कमर कसे हुए हैं,मगर जीत जिसकी होनी है वह पहले से ही निश्चित माना जा रहा है,विचारणीय बिंदु यह है कि क्या राष्ट्रपति जैसा संवैधानिक पद किसी भी राजनैतिक दल के निष्ठावान को दिया जाना चाहिए,वैसे अब इस सवाल का कोई औचित्य नहीं रह गया है,फिर भी राजनीति के दिग्गजों के सामने आम आदमी का यह प्रश्न सदैव अपना सर उठता रहेगा,क्योंकि देश में राजनीति जिस स्टार पर आ गयी है,उसमे आम आदमी शायद कहीं नहीं रह गया है ,इसे लोकतंत्र के गणित का निष्कर्ष कहें या कुछ और यह भी विमर्श का विषय है ।
Friday, 29 June 2012
Monday, 21 May 2012
aai pee el me sattebazi
आई पी एल में सट्टेबाजी :
एक दिन मैं बस में यात्रा कर रहा था , तो मेरे बगल वाली सीट पर बैठा एक युवक हाथ में दो मोबाईल लेकर बैठा था ,जिसके पास हर पांच मिनिट में एक फोन आता था और वह फोन पर आई पी एल के मैच की ताज़ा स्थिति बताता था , उसकी बातों से यह लगता था, वह युवक किसी खास टीम की जीत या हार से सम्बन्ध रख रहा है , वैसे भी इस दौरान अनेक सट्टेबाज़ पकडे जा चुके हैं .सो यह कहना गलत न होगा की सट्टेबाजी ने इस खेल को कही का भी नहीं छोड़ा है
Friday, 10 February 2012
ek vichar
चलो आकाश को छू लें
मन करता है कि पंछी बनकर मुक्त गगन में विचरण करूँ
और अपने हौंसलों को नई उडान दूँ,मगर प्रश्न उठता है कि
क्या संकीर्ण चिंतन के माध्यम से ऐसा संभव है ,आज देश में
जो दशा है,अपने स्वार्थों कि बोली बोलने में लोग अभ्यस्त
होते ja रहे हैं,तब क्या नकारात्मक दृष्टि से कोई लक्ष्य प्राप्त
करना सहज है ,मेरा एक चिंतन दिशा है,मई यही चाहता हूँ-
'चलो आकाश को छू लें ,बहुत संभावनाएं हैं ।'
- डॉ. सुधाकर आशावादी
Thursday, 9 February 2012
rashtriy chintan
देश किधर जा रहा है, इससे किसी को कोई सरोकार नहीं है,राजनीति की स्थिति बहुत गंभीर हो गई है ,
सत्ता के लिए राजनेता किसी भी हद तक गुज़र सकते हैं,कोई भी नीचता का कार्य कर सकते है, देश में
यदि कही अलगाव है,तो उसके सबसे बड़े दोषी राजनेता ही हैं,जो अपने स्वार्थ के लिए जनमानस को
लड़ाने में पीछे नहीं हैं, राजनीति को व्यापार बना दिया गया है, समझ नहीं आता कि भरे पेट नेता अपनी
भूख शांत करते हैं या गरीबों की ? दिखावा हर पेट को रोटी हर हाथ को रोजगार का करते हैं,किन्तु ये
कितने सही हैं तथा गरीबों के कितने हमदर्द हैं,यह इनके आचरण से पता चलता है, जब ये अपने अनपढ़
और योग्य रिश्तेदारों के नाम से कम्पनियां बनाकर करोड़ों अरबों के वारे न्यारे करते हैं, सवाल यह है कि
इन बहरूपियों के चंगुल से राष्ट्र को कैसे बचाया जाय ?
- डॉ. सुधाकर आशावादी
Wednesday, 1 February 2012
Wednesday, 11 January 2012
khanik chintan
मिल जाते हैं मीत कहीं जाने अनजाने
फिर उनको अपना कोई माने न माने
समय बड़ा बलवान न जाने क्या कर बैठे
समय सुनाता रहता हर पल अपनी तानें |
फिर उनको अपना कोई माने न माने
समय बड़ा बलवान न जाने क्या कर बैठे
समय सुनाता रहता हर पल अपनी तानें |
Monday, 2 January 2012
aashawadi chintan
आशावादी चिंतन
जीवन में अपेक्षाएं बहुत होती है, किन्तु अपेक्षाओं का पूरा हो पाना संभव नहीं है, ऐसे में आवश्यक यह है की हम किस प्रकार से अपने जीवन में समायोजन करते है, बिना समायोजन के कुशलतापूर्वक जीवन का सञ्चालन संभव नहीं है, सो जीवन में समायोजन के महत्व को जाने और जीवन में यथा संभव उत्कर्ष उत्कर्षप्ति करे.
जीवन में अपेक्षाएं बहुत होती है, किन्तु अपेक्षाओं का पूरा हो पाना संभव नहीं है, ऐसे में आवश्यक यह है की हम किस प्रकार से अपने जीवन में समायोजन करते है, बिना समायोजन के कुशलतापूर्वक जीवन का सञ्चालन संभव नहीं है, सो जीवन में समायोजन के महत्व को जाने और जीवन में यथा संभव उत्कर्ष उत्कर्षप्ति करे.
Sunday, 1 January 2012
shubhkamnayen
शुभकामनायें
तुम्हारी प्रेरणाएं हैं सृजन की कल्पनाएँ है
धरा पर स्वर्ग लाने के सपन हमने सजाये है
हमारी योजनाओं को तनिक विश्वास तो दे दो,
चलो आकाश को छू ले बहुत सम्भवनायें है |
- डॉ. सुधाकर आशावादी
तुम्हारी प्रेरणाएं हैं सृजन की कल्पनाएँ है
धरा पर स्वर्ग लाने के सपन हमने सजाये है
हमारी योजनाओं को तनिक विश्वास तो दे दो,
चलो आकाश को छू ले बहुत सम्भवनायें है |
- डॉ. सुधाकर आशावादी
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