Saturday, 1 February 2020

सरकारी बजट वही है केवल भूलभुलैया
जनता के पल्ले कभी कुछ नहीं पड़ा। 

Friday, 31 August 2018

लेखन किसी की बपौती नहीं है . अनुभूतियाँ प्रत्येक प्राणी के पास हैं, किन्तु उनकी कुशल अभिव्यक्ति एक अच्छे साहित्यकार की पहिचान है .
- सुधाकर आशावादी

किसी की याद में मैं क्या लिखूं
खो गया हूँ आजकल उन्हीं में .

Tuesday, 6 March 2018

सियासत में ईमानदारी की बात आजकल बेमानी है। सामाजिक व्यवहार में मूल्यों का हरास इस समस्या के मूल में है। विडंबना यह है कि जैसे को तैसा के फेर में दिशानायक भी जब प्रतिकूल आचरण करते हैं, तब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि क्या देश को अपने संकीर्ण स्वार्थों की बलिवेदी पर चढ़ाना न्यायसंगत है ?
- सुधाकर आशावादी

Friday, 16 February 2018

भूख से अधिक खाने की चाहत में
तलाशता हूँ मैं खाने के अनेक स्रोत
मगर कोई अवसर ही नहीं मिलता
भ्रष्टता की ओर अग्रसर होने का .
@ सुधाकर आशावादी

Thursday, 15 February 2018

सत्ता से दूरी और विपक्षी सियासत उल्टा चोर कोतवाल को डांटे जैसी स्थिति उत्पन्न कर रही है. नीरव मोदी विजय माल्या के उपरांत दूसरा नाम है, जिसने देश की अर्थव्यवस्था से खिलवाड़ किया है. जरूरी है कि दोषियों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाए .
@ सुधाकर आशावादी

Wednesday, 7 February 2018

विकल्पहीन सियासत लोकतंत्र को कहाँ ले जाएगी , कोई नहीं जानता . देश का दुर्भाग्य यही है कि सियासत केवल गड़े मुर्दे उखाड़ने में जुटी रहती है . तथाकथित विपक्ष अपनी कमजोरी जानते हुए भी सकारात्मक बातें करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता . सीना तानकर कुछ नहीं बोल सकता , पग पग पर उसका चोर मन उसे नजरें झुकाने को विवश करता है , वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता सिवाय बेशर्मी दिखाने के .
@ सुधाकर आशावादी