Friday, 18 July 2014

अपने घर में भी झाँकियें ज़नाब ?
हम फिलिस्तीन के लिए छाती पीट रहे हैं , इजराईल को कोस रहे हैं।  मानवता के अलम्बरदार हैं हम, मगर अमरनाथ यात्रा के दुश्मनों के खिलाफ हमारे पास शब्द नहीं हैं। मानवता  का तकाजा है कि जीयो और जीने दो के भाव से सबका सम्मान करें , किन्तु यदि कोई न सुधरे तो क्या उसका समुचित इलाज नहीं किया जाना चाहिए उसके रोग की सही पहिचान करके ?
- सुधाकर आशावादी

Tuesday, 8 April 2014

मैं आम नागरिक हूँ :

मैं व्यक्ति विशेष का प्रंशसक नहीं वरन विकास का हिमायती हूँ।
सवाल राष्ट्र का है राष्ट्रीय स्वाभिमान एवं चहुँमुखी विकास का है।
क्या मैं किसी एक खानदान के नाम पर ही समर्पित होकर इसलिए उस खानदान के लिए वोट दूँ कि उस खानदान के पालतू पशु को भी उसके कुछ अनुयायी मालिक की तरह स्वीकारते है ?
क्या मैं कुबेरवती को इसलिए वोट दूँ कि वह अपनी सनक में जगह जगह अपनी मूर्तियाँ पर्स सहित लगवा दे कि मेरी भूख नहीं मिटेगी बस मेरा पर्स भरते रहो ?
क्या मैं सिर्फ एक मज़हब का तुष्टिकरण करने वाले उस परिवार को वोट दूँ जिसका भाई,बेटा , बहू , भतीजा सभी सत्ता सुख भोगने में जुटे हैं, जिनका एकमात्र मुद्दा कुर्सी से चिपकना है , जिनका समाजवाद अपने और अपने परिवार से शुरू होकर अपने खानदान तक ही सीमित है ?
क्या उस झाड़ू मास्टर को वोट दूँ , जो स्वयं दिग्भ्रमित है , जिसे अपना नहीं पता कि उसकी कथनी करनी क्या है , गिरगिट भी जिसके सम्मुख अपना वजूद तलाशने के लिए भटक रहा है ?
….... बताइये देश के सम्मुख विकल्प कौन सा है , अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश को सशक्त बनाना है , तो सही विकल्प चुनिए , देश में केवल एक ही विकल्प है और वह विकल्प आज समूचा देश जानता है। सो देश की खातिर सही विकल्प चुनें , अन्यथा देश हमें कभी क्षमा नहीं करेगा।
- सुधाकर आशावादी

Friday, 21 March 2014

लोकतंत्र के नाम :

निसंदेह लोकसभा चुनावों की घोषणा के उपरांत विषम परिस्थितियाँ आम आदमी के सम्मुख हैं कि वह छद्म ईमानदारों के साथ खड़ा हो या 65 साल के मुकाबले 60 महीने मांगने वाले के साथ , मगर उस झूठी कसम वाले को कौन समझाए जो हम भी खेलेंगे , नहीं तो खेल बिगाड़ेंगे की तर्ज पर अपने मतलब से जनता  में रायशुमारी का ढोंग रचता फिरता है। स्वयं को राष्ट्रीय राजनीति में खपाने के लिए जिसने एक प्रान्त की जनता के साथ धोखा किया। बहरहाल लोकतंत्र की यह कमजोरी है कि कोई एक टाँग तो कोई डेढ़ टाँग से लोकतंत्र को बैसाखियों पर धकेलने की फिराक में है, जो लोकतंत्र का सबसे खतरनाक पहलू है।
- सुधाकर आशावादी

Monday, 3 March 2014

लाल नीली बत्तियाँ
अब सियासी हो गयी हैं लाल नीली बत्तियाँ
सबको भरमाने लगी हैं लाल नीली बत्तियाँ।
आदमी का आदमी से बैर होना लाजिमी है 
बिल्लियों के बीच बन्दर लाल नीली बत्तियाँ।
रैली थैली तू-तू मैं-मैं सच कहाँ सुन पाओगे
अपनी अपनी कह रही हैं लाल नीली बत्तियाँ।
झुनझुने हाथों में देकर बच्चों को बहलाएंगी
अपने मकसद से लुभाती लाल नीली बत्तियाँ।
- सुधाकर आशावादी

Friday, 28 February 2014

श्रद्धार्चन : :

बात श्रद्धा की अगर हो तो मैं तुम्हे स्वीकारता  हूँ
बिना देखे बिना समझे मैं ईश तुमको मानता हूँ
तुम अलौकिक दिव्य-शक्ति मेरा अंतस कह रहा है
तुम प्रलयंकर सृजन तुम ही,मात्र इतना जानता हूँ।
………… सुधाकर आशावादी

रे मन !

अधूरापन लिए यह ज़िन्दगी है सदा रोती
रिक्तता का थाम दामन हर कदम ढोती
जहाँ होता स्नेहबंधन वहाँ देह नहीं होती।
जहाँ देह होती है वहाँ मन की नहीं चलती।
- सुधाकर आशावादी

Thursday, 27 February 2014

देश का सियासी वातावरण जैसे राजनैतिक शुचिता से नितांत विलग नज़र आता है।  जन मानस के लिए यह समझना कठिन है कि किस पर विश्वास करे , क्योंकि अब तक जिन जिन पर आम आदमी ने विश्वास किया है उसे बदले में विश्वासघात ही सहना पड़ा है।
- सुधाकर आशावादी