महंगाई से साक्षात्कार
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- डॉ.सुधाकर आशावादी
एक दिन मैंने महंगाई से पूछा -
तुम्हारा आकार क्या है ?
तुम्हारी बढ़ोत्तरी का प्रतिशत क्या है ?
तुम्हारी कोई सीमा तो होगी ?
वह मुस्करा कर बोली -
मेरा आकार मैं स्वयं नहीं जानती
अपनी सीमा मैं नहीं पहिचानती ।
मैं बढ़ रही हूँ तब तक
जब तक मुझे सहजता से
स्वीकारा जा रहा है
सो मैं बढ़ती रहूँगी
नहीं थमूंगी ।
फिर भी मेरा वजूद जानना है
तो उस दिहाड़ीदार मजदूर से पूछिए
जो रोज अपने श्रम का सौदा करके
अपनी देह खून्दता है
और दो वक्त की रोटी भी नहीं जुटा पाता ।
जब उसे अपने श्रम का
सही मोल मिल जायेगा
और वह दो वक्त की रोटी चैन से खायेगा
तब समझना मेरा वजूद
स्वतः ही ख़त्म हो जायेगा ।।
- डॉ.सुधाकर आशावादी
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