Tuesday, 7 May 2013

एक विचार :
कभी कभी कुछ नया करने के लिए मन करता है,मगर विचारणीय है कि संसार में नया क्या है, जो भी है,वह विद्यमान है, लगभग सौ बरस पहले जो कहानियां कालकूट ने लिखी वे आज भी प्रासंगिक हैं । किसी ने सच ही कहा है कि कथानक वही रहते हैं,मगर पात्र बदलते रहते हैं । जो विद्यमान है वही तो हम प्राप्त कर रहे हैं । ज्ञान के सागर में गोते लगाने का जो आनंद है,सम्भवत: वह आनंद भौतिक सुखों में भी नहीं है,क्योंकि ज्ञान के सागर में स्नान करके मानसिक द्वार संकीर्णता में सिमटकर नहीं रह सकते । ऐसा मेरा मत है । संकीर्णताएं वहीँ प्रवेश कर सकती हैं , जहाँ व्यक्ति अपनी समझ के द्वार बंद करके पूर्वाग्रह के द्वार खोल कर रखता है ।
- सुधाकर आशावादी 

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