Thursday, 9 June 2016

अपने देश का प्रधान सेवक विश्व में भारत का डंका बजा रहा है , मगर अपने देश में कुछ लोगों की लंका लगी पड़ी है . बेचारे परेशान है कि विश्व में भारत का डंका पकिस्तान और उसके द्वारा समर्थित आतंकवाद की हवा क्यों निकाल रहा है ?
- सुधाकर आशावादी 

Friday, 25 September 2015

व्यंग्य :
चरणवंदना में निहित सम्मान 
- सुधाकर आशावादी 
संसार में यश कामना भला कौन नहीं करता ? जिसे देखो वही सम्मान प्रदाताओं की यशगाथा की स्तुति में पीछे नहीं है। भले ही स्वयं को निरपेक्ष भाव से निर्लोभी बताता फिरे, मगर सम्मान की भूख उसके भीतर कुलबुलाती रहती है। साहित्य का मंच हो या सियासत का, ऐसा कौन होगा जो अपार जनसमूह के समक्ष बड़ी माला नहीं पहनना चाहेगा, प्रतीक चिन्ह और सम्मान प्रमाण से परहेज करेगा , भीषण गर्मी में भी शॉल और श्रीफल को नकारेगा। यश कामना की भूख ऐसे है जो कभी मिटती ही नहीं। 
अपने राम खिलावन अरसे से एक ही साध रही , कि जैसे भी हो, उनकी साहित्य साधना को राजकीय स्तर पर स्वीकारा जाय । उन्हें भी यशस्वी पुरुस्कार से नवाजा जाय। जब से उनकी परम शिष्या को साहित्य साधिका का सम्मान मिला तथा सम्मान राशि के साथ साथ शॉल, श्रीफल और सम्मान प्रमाण मिला, तब से उनके भीतर बसे साहित्यकार का अहम जागृत हो गया था, वह सम्मान प्राप्त करने की दिशा में विचार करने लगे थे साथ ही आत्मविश्लेषण भी कर रहे थे, कि यदि मेरे लिखे साहित्य के आधार पर मेरी शिष्या को साहित्य साधिका सम्मान मिल सकता है , तो मुझे क्यों नहीं ? तभी से सम्मान प्राप्त करने वाले साहित्यकारों की विशिष्टता का अध्ययन करना शुरू कर दिया था रामखिलावन जी ने। यह अलग बात थी कि इस विश्लेषण में उनकी स्वयं की साहित्य साधना भी प्रभावित हो गयी थी। उन्हें कहीं से यह ज्ञात हो गया कि साहित्य सम्मान प्राप्त करने के लिए साहित्य का साधक होना अनिवार्य नहीं है। अनिवार्य है पुरुस्कार प्रदाता सत्ता से घनिष्ठता बढ़ाना। ऐसे लोगों की खोज करना जो सत्ता के इर्दगिर्द अपना जाल फैलाये रखते हैं तथा साहित्य सम्मान और साहित्यकार के बीच की दूरी पाटने में सेतु की भूमिका का निर्वाह करते हैं। इस लिए अपने साहित्यिक दम्भ को त्यागकर चरण वंदना भी करनी पड़े तो उससे परहेज नहीं होना चाहिए।  बस तभी से रामखिलावन ने सम्मान प्राप्ति के लिए एकसूत्रीय लक्ष्य निर्धारित कर लिया, कि भले ही कितने पापड़ बेलने पड़े, अपने स्वाभिमान और साहित्यिक दम्भ की बलि देनी पड़े मगर यशस्वी सम्मान पप्राप्त करके ही रहेंगे। 
रामखिलावन के जीवन में आखिर वह अवसर आ ही गया, जिसकी प्रतीक्षा में उन्होंने साहित्य सृजन में स्वयं को खपाया था, अपनी रचनाओं के आधार पर शिष्या को मिले साहित्य साधिका सम्मान की कुढ़न को भोगा था। ऐसे में वह इतने गदगद थे,कि सम्मान प्रदाता उन्हें उस गोविन्द की भांति प्रतीत हो रहा था , जिसे सम्मान के जुगाड़कर्ता गुरु की चरणवंदना के उपरान्त प्राप्त किया था। सो जैसे ही उन्हें शॉल ओढ़ाया गया , उनके हाथ में श्रीफल के साथ सम्मान राशि और सम्मान प्रमाण दिया गया , वैसे ही उन्हें अपने जीवन भर की साहित्य साधना सफल होती प्रतीत हुई तथा वे सम्मान प्रदाता गोविन्द के चरणों में झुक गए। जिन्हें साहित्य साधना के उपरान्त भी ऐसा सम्मान उपलब्ध नहीं था , उन्हें खीज मिटानी अनिवार्य थी , सो वे चरणवंदना में ही खोट निकालने लगे।  उन्हें इस बात का कतई भान नहीं था कि यह सम्मान चरणवंदना की लम्बी साधना का ही प्रतिफल है। 

Thursday, 26 February 2015

सियासी रिश्तों के चलते नीरव मोदी PNB को चूना लगा गया, जिनके शासनकाल में यह घोटाला हुआ , वही इस घोटाले पर अंगुली भी उठा रहे हैं . यानि उल्टा चोर कोतवाल को डांट रहा है. यह अवसर देश की संपदा को नुकसान पहुँचाने वालों को सबक सिखाने का है, न कि अपनी कमी औरों के मत्थे मढ़कर सनसनी फ़ैलाने का .
@ सुधाकर आशावादी

Thursday, 23 October 2014

किसी भी राष्ट्र के समग्र विकास के लिए अभिप्रेरणा की महत्वपूर्ण भूमिका है। महानायक भी वही बन सकता है. जिसका व्यक्तित्व अभिप्रेरणा प्रदान करने वाला हो।  देश में संसाधनों की कमी नहीं है , यदि कोई कमी है,तो वह है संसाधनों के उपयोग के लिए ईमानदार भावना एवं कर्तव्यनिष्ठा की। यह दायित्व केवल किसी एक व्यक्ति का नहीं है। निसंदेह देश का सौभाग्य है कि इसे एक लम्बे अंतराल के उपरान्त एक कर्तव्यनिष्ठ और अभिप्रेरक व्यक्तित्व दिशानायक के रूप में मिला है , ऐसे में आमजन को भी अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए देश के कोने कोने में जाकर जनमानस को राष्ट्रोत्थान के प्रति अभिप्रेरित करना चाहिए। क्योंकि किसी भी राष्ट्र का सर्वांगीण विकास जन भागीदारी के बिना संभव नहीं है।
- डॉ. सुधाकर आशावादी
दीवाली निसंदेह हिन्दू धर्म के अनुयायियों के लिए बड़ा पर्व है , साफ़ सफाई और अपने आप को समाज के सम्मुख समृद्ध दर्शाने की होड़ वाला पर्व। सवाल है कि पहले भारतीय संस्कृति साझा पर्वों पर आधारित थी , समाज में जब साझा स्वरुप अधिक मायने रखता था, गाँव में पर्व मनाने में जातिगत और धर्मगत भेद नहीं थे। फिर ये भेद कैसे उत्पन्न हो गए। धर्म की कट्टरता ने मानव मानव में भेद क्यों कर दिया। समाज के निर्माण में बढ़ई , जुलाहा , कहार , प्रजापति ,चर्मकार ,दरजी ,नाई  सभी की भागीदारी उपयोगी हुआ करती थी , मगर आज समाज को आधुनिकता और अधिकारों के नाम पर जिस तरह समाज का बंटवारा हुआ है , उसने हर आदमी में दम्भ का समावेश कर दिया है, यही स्थिति समाज के पतन का कारण बन रही है।
- सुधाकर आशावादी

Thursday, 16 October 2014

 लोकतंत्र में जनभावनाओं का सम्मान सर्वोपरि है,किन्तु सभी अपने अपने पूर्वाग्रह पाले हुए हैं। हम इसीलिए परेशान हैं , कि सारे के सारे एग्जिट पोल हमारे पूर्वाग्रहों पर पानी फेर रहे हैं। भैया जल्दी असली पोल बताओ ….... हमारी रातों की नींद और दिन का चैन गायब हो चुका है।
- सुधाकर आशावादी

Monday, 13 October 2014

नाम : आशू , सोनू ,गुड्डू , बबलू ,नीटू [ कुछ भी ]
शिक्षा : स्कूल के दर्शन नहीं।
स्टाइल : आँखों पर काला चश्मा, हाथ में चाइनीज मोबाईल , टशन फ़िल्मी।
काम : गर्ल्स कॉलिज के इर्द गिर्द घूमना।
उद्देश्य : सपनों में जीने वाली किशोरियों को फाँसना, उसके उपरांत उन्हें देह व्यापार के धंधे में धकेलकर उनकी कमाई से रोटी खाना।
अक्ल की अंधी बालिकाएं जब तक इस सच को समझती हैं , तब तक वह बर्बाद हो चुकी होती हैं।
…… समूचे समाज का दायित्व है कि समाज को ऐसे तत्वों से छुटकारा दिलाने के लिए गंभीर प्रयास करें , समाज की बेटियों को अच्छे संस्कार प्रदान करें। यदि कोई ऐसा तत्व बेटियों को भ्रमित करने का प्रयास करता हुआ पाया जाय , तो उसे ऐसा सबक सिखाएं , जिससे उसकी आगे आने वाली नस्लें भी ऐसे कुकृत्य से तौबा करने पर विवश हों।
- सुधाकर आशावादी