देश सिर्फ सीमाओं से नहीं बनता , सीमाओं के मध्य रहने वाले नागरिकों की राष्ट्र के प्रति समर्पित भावना से बनता है। देश का दुर्भाग्य यही है कि देश में आम आदमी का सियासी बटवारा हो चुका है ,जातीय समीकरण देश को जर्जर कर रहे हैं। समाजवाद खानदान विशेष की बपौती बन चुका है। जाति और धर्म के ठेकेदार आम आदमी को अपनी बपौती मानने में कोई संकोच नहीं करते। ऐसे में भारतीय लोकतंत्र कितना समृद्ध है , यह किसी से छिपा नहीं है।
सुधाकर आशावादी
सुधाकर आशावादी
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