क्या कहूँ कौरवों की गाथा :
कई बार सोचता हूँ कुछ न कहूँ , किन्तु विचार होते ही विश्लेषण के लिए हैं। पूर्वाग्रह और दुराग्रह एक दूसरे के इतने निकट हैं कि पहचानना कठिन है। समाज है तो सभी कुछ हैं। समाज के अभाव में कैसा पूर्वाग्रह और दुराग्रह। सभी को खाना कमाना है। राजनीति में मिशन,पाँच सितारा संत आश्रमों में मिशन की कल्पना असंभव है ,समाजवाद भी अपने घर की यश और धन की भूख मिटाने के बाद शुरू होता है। बेचारे राम मनोहर लोहिया जी बुत बने देखने को विवश हैं , कि उनका नाम लेकर न जाने कौन सा समाजवाद लाया जा रहा है। कई बार मुझे अपने विद्रोही मित्र केशव जैन केश [ जो वायुसेना से सेवानिवृत्ति के उपरांत पत्रकारिता से जुड़े थे ] का क्रोध याद आता है कहता था - मन करता है कि हाथ में स्टेन गन लेकर घूमूँ , जो भी सड़क पर कायदे कानूनों का उल्लंघन करता मिले उसे ही शूट कर दूँ। निसंदेह राजनीति के दरिंदों ने देश को जहाँ लाकर खड़ा किया है , उससे लगता है कि समाज की प्रयोगशाला में कौरवों की संख्या असल से हज़ारों गुना बढ़ चुकी है।
- सुधाकर आशावादी
कई बार सोचता हूँ कुछ न कहूँ , किन्तु विचार होते ही विश्लेषण के लिए हैं। पूर्वाग्रह और दुराग्रह एक दूसरे के इतने निकट हैं कि पहचानना कठिन है। समाज है तो सभी कुछ हैं। समाज के अभाव में कैसा पूर्वाग्रह और दुराग्रह। सभी को खाना कमाना है। राजनीति में मिशन,पाँच सितारा संत आश्रमों में मिशन की कल्पना असंभव है ,समाजवाद भी अपने घर की यश और धन की भूख मिटाने के बाद शुरू होता है। बेचारे राम मनोहर लोहिया जी बुत बने देखने को विवश हैं , कि उनका नाम लेकर न जाने कौन सा समाजवाद लाया जा रहा है। कई बार मुझे अपने विद्रोही मित्र केशव जैन केश [ जो वायुसेना से सेवानिवृत्ति के उपरांत पत्रकारिता से जुड़े थे ] का क्रोध याद आता है कहता था - मन करता है कि हाथ में स्टेन गन लेकर घूमूँ , जो भी सड़क पर कायदे कानूनों का उल्लंघन करता मिले उसे ही शूट कर दूँ। निसंदेह राजनीति के दरिंदों ने देश को जहाँ लाकर खड़ा किया है , उससे लगता है कि समाज की प्रयोगशाला में कौरवों की संख्या असल से हज़ारों गुना बढ़ चुकी है।
- सुधाकर आशावादी
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