Wednesday, 3 March 2021

भोंपू और मन की बात 

- सुधाकर आशावादी
शैतान बच्चे की हरकतें उसके खुराफाती दिमाग का परिचय देती रहती हैं। वह बच्चा खुद नहीं जानता कि उसे क्या करना है,फिर भी वह कुछ न कुछ अजीबोगरीब हरकतें करता रहता है, ताकि उसके आसपास बैठे परिजन उसकी ओर ध्यान दे। उसकी हरकतों पर चिल्लाएं, दौड़कर उसे हरकतें करने से रोके, जितना उसे रोका जाता है, वह उससे दोगने जोश से अपनी  हरकतें दोहराने लगता है। पहले तो उसके परिजन उसकी हरकतों को उसकी विशेषता बताकर प्रचारित करते हैं, किन्तु जब बच्चे की हरकतें बढ़ जाती हैं, तब वे बच्चे को इग्नोर करने लगते हैं। यह स्थिति बच्चे को कभी नहीं सुहाती।
सवाल घर का हो या देश का, ऐसे बच्चों की संख्या कम नहीं है, जो दूसरों का ध्यान अपनी ओर आकृषित कराने के लिए ऊलजुलूल हरकतें करने की जुगत में लगे रहते हैं। प्रचार तन्त्र इतना अधिक प्रभावी हो गया है कि वे ऐसे बच्चों की वीडियो फ़िल्में बनाकर प्रचारित करके व्यवसायिक लाभ उठाने में पीछे नहीं रहता। ऐसे में कभी कभी उस बालक की स्थिति साँप के मुँह में छंछुन्दर सरीखी हो जाती है। न निगली जाए न उगली। पर क्या करें, जो बालक बड़े बुजुर्गों की बात नहीं मानता, उसे फजीहत करानी ही पड़ती है। वह अपनी प्रशंसा के चलते भूल जाता है, कि प्रशंसा के नाम पर उसका उपहास उड़ाया जा रहा है। वह चढ़ा रहता है प्रशंसा के झाड़ पर और जब उसे अपनी असलियत का आभास होता है तब तक उसकी स्थिति एक ओर कुआं दूसरी ओर खाई वाली हो जाती है।

Monday, 1 March 2021

 तेरी चाहत का सिला बरकरार है ज़िंदगी 

तू गर साथ है तो सब स्वीकार है ज़िंदगी। 

Saturday, 1 February 2020

सरकारी बजट वही है केवल भूलभुलैया
जनता के पल्ले कभी कुछ नहीं पड़ा। 

Friday, 31 August 2018

लेखन किसी की बपौती नहीं है . अनुभूतियाँ प्रत्येक प्राणी के पास हैं, किन्तु उनकी कुशल अभिव्यक्ति एक अच्छे साहित्यकार की पहिचान है .
- सुधाकर आशावादी

किसी की याद में मैं क्या लिखूं
खो गया हूँ आजकल उन्हीं में .

Tuesday, 6 March 2018

सियासत में ईमानदारी की बात आजकल बेमानी है। सामाजिक व्यवहार में मूल्यों का हरास इस समस्या के मूल में है। विडंबना यह है कि जैसे को तैसा के फेर में दिशानायक भी जब प्रतिकूल आचरण करते हैं, तब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि क्या देश को अपने संकीर्ण स्वार्थों की बलिवेदी पर चढ़ाना न्यायसंगत है ?
- सुधाकर आशावादी

Friday, 16 February 2018

भूख से अधिक खाने की चाहत में
तलाशता हूँ मैं खाने के अनेक स्रोत
मगर कोई अवसर ही नहीं मिलता
भ्रष्टता की ओर अग्रसर होने का .
@ सुधाकर आशावादी

Thursday, 15 February 2018

सत्ता से दूरी और विपक्षी सियासत उल्टा चोर कोतवाल को डांटे जैसी स्थिति उत्पन्न कर रही है. नीरव मोदी विजय माल्या के उपरांत दूसरा नाम है, जिसने देश की अर्थव्यवस्था से खिलवाड़ किया है. जरूरी है कि दोषियों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाए .
@ सुधाकर आशावादी

Wednesday, 7 February 2018

विकल्पहीन सियासत लोकतंत्र को कहाँ ले जाएगी , कोई नहीं जानता . देश का दुर्भाग्य यही है कि सियासत केवल गड़े मुर्दे उखाड़ने में जुटी रहती है . तथाकथित विपक्ष अपनी कमजोरी जानते हुए भी सकारात्मक बातें करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता . सीना तानकर कुछ नहीं बोल सकता , पग पग पर उसका चोर मन उसे नजरें झुकाने को विवश करता है , वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता सिवाय बेशर्मी दिखाने के .
@ सुधाकर आशावादी

Tuesday, 6 February 2018

जिन पर शिक्षा सुधार का दायित्व है , वही शिक्षा का बंटाधार कर रहे हैं . शिक्षक शिक्षा पाठ्यक्रमों की गुणवत्ता के लिए जिस राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद का गठन किया गया , वह भी धन की बंदरबांट तक सिमट कर रह गई . यकीन न आये तो इसके द्वारा शिक्षक शिक्षा पाठ्यक्रमों की मान्यता की सभी पत्रावलियों की किसी गोपनीय एजेंसी से जांच करा कर देख लें . दूध का दूध पानी का पानी हो जायेगा .
@ सुधाकर आशावादी

Friday, 2 February 2018

जी भरके चिल्लाए जैचंद बड़ी हवेली में
आँसू भर भर लाए जैचंद बड़ी हवेली में.
कासगंज की अमन शान्ति को तजकर
अपनी जात दिखाएं जैचंद बड़ी हवेली में.
@ सुधाकर आशावादी

Wednesday, 31 January 2018

साहित्य के अलंबरदारों ने साहित्य को भी बंधक बनाने का दिवास्वप्न देखा है . खेमेबंदी ने साहित्य की दिशा और दशा को खास दड़बों तक सीमित कर दिया है . चाहे साहित्य की कोई भी विधा हो, मगर अलम्बरदार हैं कि अपना एकछत्र साम्राज्य स्थापित करने की जुगत में जुटे रहते हैं .
@ सुधाकर आशावादी

Tuesday, 9 January 2018

एक समय था, जब किताबें आम पाठक के लिए प्रकाशित की जाती थी , बिकती भी खूब थी, तब प्रकाशक गिने चुने लेखकों की पुस्तकें छाप कर अधिक मुनाफा नहीं कमाते थे । अब किताबें नही बिकती, जुगाड़ से खपाई जाती हैं, किताबें आम पाठक की पहुँच से बाहर हैं । 96 पेज की पुस्तक 200 रूपये, 192 पेज की पुस्तक 400 रूपये में भला कौन खरीदकर पढ़ेगा ? कुछ मौलिक स्वनाम धन्य लेखक तथा कुछ पैसे देकर अपने नाम से पुस्तक लिखाने वाले तथाकथित लेखक पैसे देकर पुस्तकें छपवाते हैं। आजकल पुस्तकें खूब छप रही हैं। पुस्तक मेला विमोचन का केंद्र बना हुआ है । मुनाफा पुस्तक बिक्री में नही, पुस्तकें छापने में ही अधिक लगता है । लेखक भी खुश और प्रकाशक भी । सब अपने में मस्त । आम पाठक तक पुस्तक पहुँचे न पहुँचे, स्वान्तः सुखाय और स्वान्तः छपाय के साथ फेसबुक पर फोटो चिपकाय का अलग ही आनन्द है । खैर साहित्य तो समृद्ध हो ही रहा है .
@ सुधाकर आशावादी

Wednesday, 22 February 2017

सृजनशीलता सभी समस्याओं का समाधान है
अपने कार्य में मग्न रहकर ही सृजन संभव है
सो आओ अपने समय का सदुपयोग करें
जो करें जन कल्याण के प्रति समर्पित हो .
@ सुधाकर आशावादी

Wednesday, 7 September 2016

चाहता हूँ देह के उपयोग से हो कुछ जगत कल्याण
निष्काम भावना हो निहित हर कर्म में इस देह के।
चाहता हूँ देह का उद्देश्य पूरा हो जगत में जैसे भी हो 
जिसकी खातिर देह मेरी अवतरित है इस धरा पर।
- सुधाकर आशावादी

Thursday, 9 June 2016

अपने देश का प्रधान सेवक विश्व में भारत का डंका बजा रहा है , मगर अपने देश में कुछ लोगों की लंका लगी पड़ी है . बेचारे परेशान है कि विश्व में भारत का डंका पकिस्तान और उसके द्वारा समर्थित आतंकवाद की हवा क्यों निकाल रहा है ?
- सुधाकर आशावादी 

Friday, 25 September 2015

व्यंग्य :
चरणवंदना में निहित सम्मान 
- सुधाकर आशावादी 
संसार में यश कामना भला कौन नहीं करता ? जिसे देखो वही सम्मान प्रदाताओं की यशगाथा की स्तुति में पीछे नहीं है। भले ही स्वयं को निरपेक्ष भाव से निर्लोभी बताता फिरे, मगर सम्मान की भूख उसके भीतर कुलबुलाती रहती है। साहित्य का मंच हो या सियासत का, ऐसा कौन होगा जो अपार जनसमूह के समक्ष बड़ी माला नहीं पहनना चाहेगा, प्रतीक चिन्ह और सम्मान प्रमाण से परहेज करेगा , भीषण गर्मी में भी शॉल और श्रीफल को नकारेगा। यश कामना की भूख ऐसे है जो कभी मिटती ही नहीं। 
अपने राम खिलावन अरसे से एक ही साध रही , कि जैसे भी हो, उनकी साहित्य साधना को राजकीय स्तर पर स्वीकारा जाय । उन्हें भी यशस्वी पुरुस्कार से नवाजा जाय। जब से उनकी परम शिष्या को साहित्य साधिका का सम्मान मिला तथा सम्मान राशि के साथ साथ शॉल, श्रीफल और सम्मान प्रमाण मिला, तब से उनके भीतर बसे साहित्यकार का अहम जागृत हो गया था, वह सम्मान प्राप्त करने की दिशा में विचार करने लगे थे साथ ही आत्मविश्लेषण भी कर रहे थे, कि यदि मेरे लिखे साहित्य के आधार पर मेरी शिष्या को साहित्य साधिका सम्मान मिल सकता है , तो मुझे क्यों नहीं ? तभी से सम्मान प्राप्त करने वाले साहित्यकारों की विशिष्टता का अध्ययन करना शुरू कर दिया था रामखिलावन जी ने। यह अलग बात थी कि इस विश्लेषण में उनकी स्वयं की साहित्य साधना भी प्रभावित हो गयी थी। उन्हें कहीं से यह ज्ञात हो गया कि साहित्य सम्मान प्राप्त करने के लिए साहित्य का साधक होना अनिवार्य नहीं है। अनिवार्य है पुरुस्कार प्रदाता सत्ता से घनिष्ठता बढ़ाना। ऐसे लोगों की खोज करना जो सत्ता के इर्दगिर्द अपना जाल फैलाये रखते हैं तथा साहित्य सम्मान और साहित्यकार के बीच की दूरी पाटने में सेतु की भूमिका का निर्वाह करते हैं। इस लिए अपने साहित्यिक दम्भ को त्यागकर चरण वंदना भी करनी पड़े तो उससे परहेज नहीं होना चाहिए।  बस तभी से रामखिलावन ने सम्मान प्राप्ति के लिए एकसूत्रीय लक्ष्य निर्धारित कर लिया, कि भले ही कितने पापड़ बेलने पड़े, अपने स्वाभिमान और साहित्यिक दम्भ की बलि देनी पड़े मगर यशस्वी सम्मान पप्राप्त करके ही रहेंगे। 
रामखिलावन के जीवन में आखिर वह अवसर आ ही गया, जिसकी प्रतीक्षा में उन्होंने साहित्य सृजन में स्वयं को खपाया था, अपनी रचनाओं के आधार पर शिष्या को मिले साहित्य साधिका सम्मान की कुढ़न को भोगा था। ऐसे में वह इतने गदगद थे,कि सम्मान प्रदाता उन्हें उस गोविन्द की भांति प्रतीत हो रहा था , जिसे सम्मान के जुगाड़कर्ता गुरु की चरणवंदना के उपरान्त प्राप्त किया था। सो जैसे ही उन्हें शॉल ओढ़ाया गया , उनके हाथ में श्रीफल के साथ सम्मान राशि और सम्मान प्रमाण दिया गया , वैसे ही उन्हें अपने जीवन भर की साहित्य साधना सफल होती प्रतीत हुई तथा वे सम्मान प्रदाता गोविन्द के चरणों में झुक गए। जिन्हें साहित्य साधना के उपरान्त भी ऐसा सम्मान उपलब्ध नहीं था , उन्हें खीज मिटानी अनिवार्य थी , सो वे चरणवंदना में ही खोट निकालने लगे।  उन्हें इस बात का कतई भान नहीं था कि यह सम्मान चरणवंदना की लम्बी साधना का ही प्रतिफल है। 

Thursday, 26 February 2015

सियासी रिश्तों के चलते नीरव मोदी PNB को चूना लगा गया, जिनके शासनकाल में यह घोटाला हुआ , वही इस घोटाले पर अंगुली भी उठा रहे हैं . यानि उल्टा चोर कोतवाल को डांट रहा है. यह अवसर देश की संपदा को नुकसान पहुँचाने वालों को सबक सिखाने का है, न कि अपनी कमी औरों के मत्थे मढ़कर सनसनी फ़ैलाने का .
@ सुधाकर आशावादी

Thursday, 23 October 2014

किसी भी राष्ट्र के समग्र विकास के लिए अभिप्रेरणा की महत्वपूर्ण भूमिका है। महानायक भी वही बन सकता है. जिसका व्यक्तित्व अभिप्रेरणा प्रदान करने वाला हो।  देश में संसाधनों की कमी नहीं है , यदि कोई कमी है,तो वह है संसाधनों के उपयोग के लिए ईमानदार भावना एवं कर्तव्यनिष्ठा की। यह दायित्व केवल किसी एक व्यक्ति का नहीं है। निसंदेह देश का सौभाग्य है कि इसे एक लम्बे अंतराल के उपरान्त एक कर्तव्यनिष्ठ और अभिप्रेरक व्यक्तित्व दिशानायक के रूप में मिला है , ऐसे में आमजन को भी अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए देश के कोने कोने में जाकर जनमानस को राष्ट्रोत्थान के प्रति अभिप्रेरित करना चाहिए। क्योंकि किसी भी राष्ट्र का सर्वांगीण विकास जन भागीदारी के बिना संभव नहीं है।
- डॉ. सुधाकर आशावादी
दीवाली निसंदेह हिन्दू धर्म के अनुयायियों के लिए बड़ा पर्व है , साफ़ सफाई और अपने आप को समाज के सम्मुख समृद्ध दर्शाने की होड़ वाला पर्व। सवाल है कि पहले भारतीय संस्कृति साझा पर्वों पर आधारित थी , समाज में जब साझा स्वरुप अधिक मायने रखता था, गाँव में पर्व मनाने में जातिगत और धर्मगत भेद नहीं थे। फिर ये भेद कैसे उत्पन्न हो गए। धर्म की कट्टरता ने मानव मानव में भेद क्यों कर दिया। समाज के निर्माण में बढ़ई , जुलाहा , कहार , प्रजापति ,चर्मकार ,दरजी ,नाई  सभी की भागीदारी उपयोगी हुआ करती थी , मगर आज समाज को आधुनिकता और अधिकारों के नाम पर जिस तरह समाज का बंटवारा हुआ है , उसने हर आदमी में दम्भ का समावेश कर दिया है, यही स्थिति समाज के पतन का कारण बन रही है।
- सुधाकर आशावादी