Tuesday, 5 November 2013

किसी भी एक भूभाग पर रहने वालों में अपने भूभाग के प्रति जो समर्पण की भावना होती है , उसे ही शायद राष्ट्रभक्ति की संज्ञा दी जाती है , मगर भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में राष्ट्रभक्ति से पहले न जाने कैसी कैसी भक्तियां और विप्लवकारी अभिव्यक्तियों का साम्राज्य है ,जिनसे लगता है कि राष्ट्र से पहले जनमानस के स्वार्थ हैं। कोई भी देश की एकता और अखंडता की बात नहीं करता , बल्कि संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति हेतु कुचक्र रचता रहता है। विडंबना यही है कि हम अपने कुतर्कों के चलते अपनी मानवीय सोच को भी अमानवीय बनाने में पीछे नहीं हैं।
-सुधाकर आशावादी

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